गीता चतुर्थ अध्याय अर्थ सहित Bhagavad Gita Chapter – 4 with Hindi and English Translation

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २१

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४-२१॥

-: हिंदी भावार्थ :-

आशारहित, जीते हुए अंतःकरण वाला और सभी संग्रहों का त्याग करने वाला मनुष्य केवल शरीर-निर्वाह संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता॥21॥

-: English Meaning :-

One who is free from desires, is of controlled mind and has relinquished all possessions, does not incur any sin by doing actions for sustenance of the body.॥21॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २२

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥४-२२॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जो स्वतः प्राप्त वस्तु से संतुष्ट, द्वंद्वों(हर्ष-शोक आदि) से अतीत, ईर्ष्या रहित और सफलता- असफलता में समान रहने वाला हो, वह कर्मों को करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता॥22॥

-: English Meaning :-

One who is satisfied with whatever comes his way by fate, is beyond the pairs of opposites, is free from envy, is unperturbed in success and failure, he/she is not bound by his/her actions even after do them.॥22॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २३

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥४-२३॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जिसका चित्त निरन्तर मुक्ति के ज्ञान में स्थित है- केवल यज्ञ सम्पादन के लिए कर्म करने वाले उस मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं॥23॥

-: English Meaning :-

One who has destroyed his attachment, with mind established in the knowledge of liberation, who acts for the sake of (Yagya) sacrifice, all his/her actions disappear. (have no binding effect)॥23॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २४

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४-२४॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जिस यज्ञ में अर्पित पदार्थ भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा ब्रह्म रूपी अग्नि में आहुति रूपी क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्म रूपी कर्म में स्थित रहने वाले के द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है॥24॥

-: English Meaning :-

If in a Yagya (sacrifice) Brahma is the offering, Brahma is the oblation and Brahma is the performer of Yagya into the fire of Brahma, in that action established in Brahma, Brahma definitely shall be reached.॥24॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २५

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥४-२५॥

-: हिंदी भावार्थ :-

दूसरे मनुष्य देव-उपासना रूपी यज्ञ का ही भली-भाँति करते हैं और अन्य ब्रह्म रूपी अग्नि में (अभेद दर्शन द्वारा आत्म रूपी) यज्ञ का हवन करते हैं॥25॥

-: English Meaning :-

Other Yogis worship the other Gods as their Yagya and still others perform Yagya the fire of Brahma with Self as the offering in the sacrifice(Yagya).॥25॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २६

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥४-२६॥

-: हिंदी भावार्थ :-

अन्य योगी श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों का संयम रूपी अग्नियों में हवन करते हैं और दूसरे योगी शब्दादि सभी विषयों का इन्द्रिय रूपी अग्नियों में हवन करते हैं॥26॥

-: English Meaning :-

Other Yogis offer hearing and other sense actions in the fires of restraint; others offer sound and other sense objects in the fires of the senses as their sacrifice(Yagya).॥26॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २७

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥४-२७॥

-: हिंदी भावार्थ :-

दूसरे योगी इन्द्रियों और प्राणों की सभी क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम योग की अग्नि में हवन करते हैं ॥27॥

-: English Meaning :-

And others sacrifice all the actions of the senses and the vital airs (prana) in the fire kindled by the knowledge of the Yoga of self-restraint.॥27॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २८

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥४-२८॥

-: हिंदी भावार्थ :-

कुछ मनुष्य द्रव्य से यज्ञ करने वाले हैं और कुछ तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योग रूपी यज्ञ करने वाले हैं। कुछ यत्नशील मनुष्य अहिंसादि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं॥28॥

-: English Meaning :-

Some sacrifice their wealth, live by austerity, perform Yoga. And others diligently do Yagya of Knowledge through studying scriptures endowed with difficult vows like non-violence, etc.॥28॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – २९

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४-२९॥

-: हिंदी भावार्थ :-

कुछ योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं और दूसरे प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं। कुछ अन्य प्राणायाम परायण योगी प्राण और अपान की गति को रोककर॥29॥

-: English Meaning :-

Some offer prana (outgoing breath) in apana (incoming breath) and others apana in prana. Some others who practice Pranayama (restraint of breath) stop the flow of prana and apana -॥29॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३०

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥४-३०॥

-: हिंदी भावार्थ :-

नियमित आहार द्वारा प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥30॥

-: English Meaning :-

taking regulated food, offer 9vital airs) prana in prana. All these seekers are knowers of (Yagya) sacrifice and destroy their sins by performing it.॥30॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३१

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥४-३१॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए तो यह पृथ्वी भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?॥31॥

-: English Meaning :-

O best among Kurus! Those who take the remnant of the sacrifice as ambrosia, attain the Eternal Brahma. For those who do not perform Yagya, even this world is not pleasant, then how can the other world be.॥31॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३२

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥४-३२॥

-: हिंदी भावार्थ :-

इस प्रकार यज्ञ, बहुत तरह से ब्रह्मा के मुख से (वेदों में) विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तुम (मन, इन्द्रिय और शरीर की) क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान कर और उनके अनुष्ठान द्वारा (कर्म-बंधन) से मुक्त हो जाओ॥32॥

-: English Meaning :-

Thus many sacrifices are elaborated by the Brahmaa in the Vedas. Know them to be born out of actions and perform them to be liberated.॥32॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३३

श्रेयान्द्रव्यमयाद्य ज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥४-३३॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है (क्योंकि) सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं॥33॥

-: English Meaning :-

O tormentor of the foes! Superior is the sacrifice of Knowledge to that with objects. Because, O son of Prutha! all actions find their end in that eternal Knowledge.॥33॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३४

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥४-३४॥

-: हिंदी भावार्थ :-

उस ज्ञान को तुम तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर जानो। उनको दण्डवत्‌ प्रणाम करने से, सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तुम्हें उस का उपदेश करेंगे॥34॥

-: English Meaning :-

Experience that knowledge by going to the enlightened and realized men. Prostrate before them, serve them, ask them direct question. They will tell you the Ultimate Truth.॥34॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३५

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥४-३५॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे अर्जुन! जिसको जानकर फिर तुम इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे। जिस ज्ञान द्वारा तुम सम्पूर्ण भूतों को पहले अपने में और फिर मुझ (परमात्मा) में देखोगे॥35॥

-: English Meaning :-

O Pandava! Knowing that you shall not be deluded again and by which, you will see all beings in your Self and then in Me.॥35॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३६

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥४-३६॥

-: हिंदी भावार्थ :-

यदि तुम अन्य सभी पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी इस ज्ञान रूपी नाव द्वारा निःसंदेह पाप-समुद्र को पार कर लोगे॥36॥

-: English Meaning :-

Even if you are the most sinful among all the sinners, you shall definitely cross the ocean of your sins by the boat of Knowledge.॥36॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३७

यथैधांसि समिद्धोऽग्नि र्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥४-३७॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे अर्जुन! जिस प्रकार अग्नि लकड़ियों को जला देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को जला देती है॥37॥

-: English Meaning :-

O Arjun! As fire burns the wood to the ashes, so does the fire of wisdom burns the (effect of) all actions.॥37॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३८

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥४-३८॥

-: हिंदी भावार्थ :-

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को (कर्म)योग द्वारा सिद्ध (शुद्धान्तःकरण) हुआ मनुष्य, कुछ समय पश्चात् अपने आप में ही पा लेता है॥38॥

-: English Meaning :-

There is nothing in this world as holy as this Knowledge. This Knowledge is attained by one who purify his mind by Yoga and finds it in himself by himself after some time.॥38॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ३९

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम चिरेणाधिगच्छति॥४-३९॥

-: हिंदी भावार्थ :-

निरंतर प्रयत्न करने वाला, इन्द्रिय संयम करने वाला और श्रद्धा से युक्त मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है। ज्ञान को प्राप्त होकर वह शीघ्र ही (परम) शान्ति को प्राप्त हो जाता है॥39॥

-: English Meaning :-

He who constantly tries, controls his senses and is full of reverence attains Knowledge. With this Knowledge, he soon finds the Supreme Peace.॥39॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ४०

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४-४०॥

-: हिंदी भावार्थ :-

विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य (परमार्थ से) भ्रष्ट हो जाता है। उस के लिए न यह लोक सुखप्रद है और न परलोक ही॥40॥

-: English Meaning :-

The indiscriminate, devoid of reverence and the one with lot of doubts gets diverged (from the eternal path). For him, neither this world is pleasant, nor the other (after death).॥40॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ४१

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय॥४-४१॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे धनंजय! (कर्म) योग से सभी कर्मों को परमात्मा में अर्पण करने वाले, विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश करने वाले और अपने वश में किए हुए अन्तःकरण वाले मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते॥41॥

-: English Meaning :-

O Dhananjaya! To one who renounces his actions by Yoga (in the Supreme), who removes his doubts by right discrimination, is self-controlled, actions (and effects) can not bind.॥41॥


गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक – ४२

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमा तिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४-४२॥

-: हिंदी भावार्थ :-

इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तुम हृदय में स्थित, अपने इस अज्ञानजनित संशय का, ज्ञान रूपी तलवार द्वारा छेदन करके (कर्म) योग में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ॥42॥

-: English Meaning :-

Therefore O Bharata! destroy this doubt, which is residing in your heart due to ignorance with the sword of Knowledge. Get established in Yoga. Arise for the war.॥42॥


गीता चतुर्थ अध्याय समाप्त –

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

-: हिंदी भावार्थ :-

ॐ तत् सत् ! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषत् में श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी ज्ञान कर्मसंन्यास योग नाम वाला चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥

-: English Meaning :-

Om That is Truth! This completes the fourth chapter of Srimadbhagwad Gita, an Upanishat to unify one with Lord. Fourth chapter which depicts the conversation between Sri Krishna and Arjun, and is named as “Yoga of Knowledge and Renunciation from Action”.


2 thoughts on “गीता चतुर्थ अध्याय अर्थ सहित Bhagavad Gita Chapter – 4 with Hindi and English Translation”

  1. Beautiful work!
    But in chapter 4 only 20 shlokas are given.
    Please give all shlokas of chapter 4.
    I refer to it everyday and share it with about 30 friends everyday.

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