गीता द्वितीय अध्याय अर्थ सहित Bhagavad Gita Chapter – 2 with Hindi and English Translation

गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ३७

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥२-३७॥

-: हिंदी भावार्थ :-

यदि तुम युद्ध में मारे गए तो तुम स्वर्ग को प्राप्त करोगे अन्यथा युद्ध में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे अर्जुन! तुम युद्ध का निश्चय करके खड़े हो जाओ॥37॥

-: English Meaning :-

If you are killed in the battle, you will reach heaven; on victory, you will enjoy the kingdom on earth. So O son of Kunti! arise with determination to fight.॥37॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ३८

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥२-३८॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, युद्ध में लग जाओ, इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगे॥38॥

-: English Meaning :-

Treat victory and defeat, gain and loss, pleasure and pain alike and fight in the battle. On fighting like this, you will not incur sin.॥38॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ३९

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥२-३९॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे पार्थ! तुम्हारे लिए यह बुद्धि ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तुम इसको कर्मयोग के विषय में सुनो। जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बंधन को नष्ट कर सकोगे॥39॥

-: English Meaning :-

O Patha! This reasoning is said to you about Sankhya (path of knowledge). Now listen the reasoning about Yoga. Following this you will destroy the bond of actions.॥39॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४०

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥२-४०॥

-: हिंदी भावार्थ :-

इस कर्मयोग में आरंभ का नाश नहीं है और इसमें उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस(कर्मयोग रूप) धर्म का थोड़ा-सा भी साधन(जन्म-मृत्यु रूपी) महान भय से रक्षा कर लेता है॥40॥

-: English Meaning :-

There is no loss of effort in Karma Yoga. It does not have the defect of negative after-effect. Even a little adherence to it can save one from great fear(of birth and death cycle).॥40॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४१

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥२-४१॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं॥41॥

-: English Meaning :-

O descendant of Kuru! Determination for adherence to Karma Yoga is single-minded. But those who are not willing to put effort into it are of various thoughts and endless sub-thoughts.॥41॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४२

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥२-४२॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे अर्जुन! जो(अयथार्थ वेद के कहने वाले) अविवेकीजन इस प्रकार की(बनावटी) शोभायुक्त वाणी कहा करते हैं कि स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है,॥42॥

-: English Meaning :-

O Patha! Those (ignorant persons) who do not know the real meaning of Vedas and falsely claim that there is nothing beyond heaven with glorifying speeches.॥42॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४३

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥२-४३॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जिनके लिए स्वर्ग ही परम प्राप्य है, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं में रूचि रखने वाले हैं,॥43॥

-: English Meaning :-

For them, heaven is the only ultimate aim, they are interested in multiple actions which give pleasure and wealth and result in multiple birth and death.॥43॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४४

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥२-४४॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, और जिनका चित्त उस वाणी द्वारा हर लिया गया है, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती॥44॥

-: English Meaning :-

Those men, who are very much attached to pleasure and wealth and whose minds are drawn away by that flowery speech, are unable to fix their mind with determination in Karma Yoga.॥44॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४५

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥२-४५॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों(सत्त्व, रज और तम) के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तुम उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है।) को न चाहने वाले और आत्म-परायण बनो॥45॥

-: English Meaning :-

The Vedas do talk about the triad of the gunas (sattva, raja and tama) which give mundane pleasure and wealth. O Arjun! Become free from the triad of the gunas! Be free from pairs (pleasure- pain, heat-cold). Establish in eternal Lord. Be free from acquisition and preservation of things. Establish in Self.॥45॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४६

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥२-४६॥

-: हिंदी भावार्थ :-

जिस प्रकार सब ओर से परिपूर्ण जलाशय से मनुष्य का प्यास भर जल का ही प्रयोजन होता है, उसी प्रकार ब्राह्मण(मुमुक्षु) का समस्त वेदों के केवल आवश्यक अंश में ही प्रयोजन रह जाता है॥46॥

-: English Meaning :-

Just as a thirsty man requires only sufficient water for quenching his thirst from a reservoir, full of water; similarly a liberated person takes that portion from the Vedas which is essential.॥46॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४७

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥२-४७॥

-: हिंदी भावार्थ :-

तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, उनके फलों में नहीं। तुम कर्मों के फल का कारण मत बनो और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥47॥

-: English Meaning :-

Your authority(duty, control) is in actions alone and not in their results. Results of action should not be your motive and you should not get attached to inaction either.॥47॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४८

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥२-४८॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे धनंजय! योग में स्थित रहते हुए तुम आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान रह कर कर्मों को करो, इस समता को ही योग कहते हैं॥48॥

-: English Meaning :-

O Dhananjaya(winner of money) Remain established in Yoga, you do your duty, without attachment and with indifference to success or failure. This evenness is called Yoga.॥48॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ४९

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥२-४९॥

-: हिंदी भावार्थ :-

हे धनंजय! इस(समता-रूपी) बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी के हैं इसलिए तुम समबुद्धि का ही आश्रय लो क्योंकि आसक्ति पूर्वक कर्म करने वाले अत्यंत दीन हैं॥49॥

-: English Meaning :-

O Dhananjaya! Actions with attachment for mundane things are far inferior to this Yoga of evenness. So you take refuge of this equanimity as those who act due to attachments are wretched.॥49॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ५०

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥२-५०॥

-: हिंदी भावार्थ :-

(सम)बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों से इसी लोक में मुक्त हो जाता है इसलिए तुम समत्व रूप योग के लिए प्रयत्न करो, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है(अर्थात् कर्म-बंधन से छूटने का उपाय है)॥50॥

-: English Meaning :-

A person endowed with this wisdom of equanimity becomes free from good and bad on this earth itself. So you try for this Yoga of equanimity. Performing actions with adherence to this Yoga is the real skill.(as it frees from bondage of actions and their results.)॥50॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ५१

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥२-५१॥

-: हिंदी भावार्थ :-

क्योंकि कर्म-बुद्धि से युक्त मनीषी(विचारक) भी कर्मों के फल को त्यागकर जन्म-रूपी बंधन से मुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं॥51॥

-: English Meaning :-

Because even thinkers inclined towards actions, performing their actions without attachment to their results, become free from the bond of rebirth and attain the ultimate changeless abode॥51॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ५२

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥२-५२॥

-: हिंदी भावार्थ :-

(इस प्रकार कर्म करते हुए) जिस काल में तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली-भाँति पार कर जाएगी, उस समय तुम सुने हुए और भविष्य में सुनने वाले सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे॥52॥

-: English Meaning :-

(Practicing like this) when your intellect will fully cross beyond the mire of delusion, then you will become unattached to all the pleasures you have heard of till now or will hear in future.॥52॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ५३

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥२-५३॥

-: हिंदी भावार्थ :-

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब स्थिर होकर अचल समाधि में स्थित हो जाएगी तब तुम्हारी बुद्धि योग को प्राप्त हो जाएगी॥53॥

-: English Meaning :-

When your intellect, which is now perplexed by hearing various thoughts, will become steady and established in Self, you will attain this Yoga.॥53॥


गीता द्वितीय अध्याय श्लोक – ५४

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥२-५४॥

-: हिंदी भावार्थ :-

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर प्रज्ञा वाले पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिर-बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

-: English Meaning :-

Arjun says – O Keshava! What are the characteristics of man with established intellect? How does that man of steady intellect speak, how he sits and how he moves?॥54॥


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