रचनात्मक या संरचनात्मक मूल्यांकन और आकलित या योगात्मक मूल्यांकन

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पिछले कुछ दशकों से मापन तथा मूल्यांकन के क्षेत्र में नीचे दिए गए विभिन्न प्रकार के नये तरीकों को शामिल किया गया है, जिससे प्रचलित परिपाटियों एवं साधनों की कमियों को दूर करने में मदद मिली है।
1. रचनात्मक व आकलित मूल्यांकन
2. सामान्यीकृत व इप्सेटिव मापन
3. प्रश्न बैंक
4. सेमेस्टर प्रणाली
5. कम्प्यूटरों के उपयोग
6. प्राप्तांकों का परिमापन
7. परीक्षा में पारदर्शिता तथा सार्वजनिक परीक्षाओं का प्रभावीकरण
8. खुली पुस्तक परीक्षा प्रणाली जैसे नवाचारों पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

मिचैल स्क्रीवेन ने सन् 1967 में मूल्यांकन की भूमिका पर चर्चा करते हुए इसे रचनात्मक या संरचनात्मक मूल्यांकन और आकलित या योगात्मक मूल्यांकन नाम से दो भागों में विभाजित कर दिया।

रचनात्मक या संरचनात्मक मूल्यांकन :-

रचनात्मक मूल्यांकन से तात्पर्य यह है कि किसी शैक्षिक कार्यक्रम, योजना प्रक्रिया आदि में मूल्यांकन करके सुधार किया जाये। रचनात्मक मूल्यांकन में किसी शैक्षिक कार्यक्रम या किसी योजना की गुणवत्ता और उसकी उपयोगिता का आंकलन किया जाता है। जिससे उसको और अधिक उपयोगी और प्रभावशाली बनाया जा सके।

रचनात्मक या संरचनात्मक मूल्यांकन के उदाहरण के लिए जैसे परीक्षाओं और विभिन्न कार्यकलापों द्वारा छात्रों के ज्ञान का मूल्यांकन किया जाता है यह एक प्रकार का रचनात्मक मूल्यांकन ही है। इस मूल्यांकन के द्वारा शिक्षकों और छात्रों दोनों को अपने कमियों को दूर करने और गुणवत्ता सुधारने का अवसर मिलता है। इसलिए रचनात्मक या संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षक और छात्रों दोनों के लिए उपयोगी साबित होता है।

आकलित या योगात्मक मूल्यांकन :-

आकलित या योगात्मक मूल्यांकन से हम किसी ऐसी योजना, काम करने के तरीकों या पहले से ही चल रहे किसी शैक्षिक कार्यक्रम से हो रहे प्रभावों और ज्ञान का मूल्यांकन करते हैं। आकलित या योगात्मक मूल्यांकन की समय अवधि दीर्घकालीन होती है। आकलित या योगात्मक मूल्यांकन मूल्यांकन का सबसे अच्छा उदाहरण हैं, विद्यालयों में होने वाले वार्षिक परीक्षा जिसमें छात्रों के पूरे साल में अर्जित किये गए ज्ञान का आंकलन किया जाता है, जिससे छात्र के अगली कक्षा में जाने और न जाने का निर्णय लिया जाता है।

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